करीब
साल, दो साल से अभिव्यक्ति की आज़ादी पर बड़ा शोर-शराबा चल रहा है। और हम
ठहरे मध्यम वर्गीय, अरे यार हमें कहाँ इतना वक़्त मिलता इन सब बातों को
समझने का, कुरेदने का और कहे बाल की खाल निकालने का। जग जाहिर है, हम तो
ठहरे बेवकूफ, जिसने जो कहा मान लिया और कहीं टाइम पास चर्चा हुई तो सुन भी
लिया, दो टिप्पणियां भी कर दी, बस।
अब क्या...
भाई हम तो
भूल भी गए, कहाँ जिंदगी की इस ज़द्दोजहद में इन सब चीजों के लिए वक़्त है।
दिनभर काम किया, घर आये, खाना खाया, थोड़ा टीवी देखा, हो-हल्ला सुन सो
गए....
कल फिर वही ज़िन्दगी।
पर आज लगा हमे कुछलोग (तथाकथित
बुद्धिजीवी) वाकई में बेवकूफ ही समझने लगे है। हम उतने भी गधे नही है, जो
UP मार्किट में चल रहे है। सोचा थोड़ी व्यख्या की जाए इस "अभिव्यक्ति की
आज़ादी" का।
साहब हम गांव से आते है, वंही सरकारी स्कूल में शिक्षा
पायी, पर जो मास्टरजी थे हमारे, हमे बड़ी गूढ़ बात बताई थी। उन्होंने कहा था
की किसी भी शब्द या वाक्य का भावार्थ समझना हो तो उसका विक्षेद कर दो,
यानि तोड़-तोड़ के समझो। वाकई बड़ी कारगर थी ये युक्ति। हमने भी यहाँ यही
किया, 'अभिव्यक्ति' और 'आज़ादी' - दो शब्द।
'अभिव्यक्ति' - अब इसे
तोड़े तो पता चला जो हमारे भीतर की आवाज़ है उसे व्यक्त करना, प्रकट करना,
अपनी वाणी का इस्तेमाल करते हुए बहार लाना। अब ये अंदर क्या हो सकता है,
क्या बातें हो सकती है -
अपने विचारों को रखना, अच्छे या बुरे जो
भी, जो आपके प्रिये उनकी प्रसंशा, जो अप्रिय उसकी बुराई, किसी के बात पे
असहमत होने पे अपने कुंठित उदगार, सहमति पे बधाई देना अभिव्यति है। और तो
और गली-गलौज, अपशब्द कहना भी एक तरह से अभिव्यक्ति (किसी खास के प्रति,
मेरी समझ से) ही तो है।
'आज़ादी' - शब्द तो वैसे बोल-चाल में काफी आसान है पर इसकी व्यख्या उतनी ही मुश्किल। आज़ादी-खुली हवा में सांस लेने की,
नये सपनें देखने की, आने वाले कल को बेहतर बनाने की | आज़ादी बोलने की, कुछ
नया करने की, आज़ादी सोचने की, आज़ादी का मतलब बिना रोक टोक किसी काम को
करने की। पर ध्यान रहे ये आज़ादी हमने कुछ शर्तों पे मिली है। हमारा
संविधान है उसके अनुकूल व्यव्हार और विचार हो तो ही आज़ादी है। हम आज़ाद है
जरूर है पर किसी शर्त पे और उस शर्त पे जब आंच आये उसकी संप्रभुता का हनन
हो, तो शायद वो आज़ादी नही खिलाफत होती है।
अब यहाँ थोड़ा समझे तो
किसी को गली देना अपशब्द कहना अभिव्यक्ति तो है पर उसकी आज़ादी कानून सम्मत
नही है, वैसे ही देश के भीतर की समस्या उजागर करना अभिव्यक्ति की आज़ादी है
पर उस बिना पे देश को तोडने की बात करना अभिव्यक्ति की आज़ादी कैसे?
अब शायद हमने अभिव्यक्ति की आज़ादी को फिर से समझने और समझाने की जरुरत है।
ये मेरी अभिव्यक्ति है आप सहमत हो सकते हो नही भी, पर मेरी अभिव्यक्ति शर्तों की खिलाफत नही करती।