Sunday, January 6, 2019

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।

धुन्ध की चादरें का साया था,
अब धूप की गर्माहट छा रही है।
हरे थे जो सरसों के खेत चहुं ओर
अब पीली सी गहरी परत मुस्कुरा रही है।

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।

पड़ी है जो नफरत की गर्द चादर दिल पर,
मिटाओ उसे कर बातें मिलकर।
रही होगी कुछ गलतियां तुम्हारी भी,
मानो उसे और बढ़ो आगे साथ चलकर।

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।