Monday, February 25, 2013

पहली किरण

बहुत दिनों बाद आज देखी सुबह की पहली किरण
कितनी सुन्दर, कितनी निर्मल ।
वो कोयल की कूंक और चिड़ियों की कल कल
 सितारें पद रहे है धुंधले,
और अँधेरा छंट रहा पल पल।

मंद मंद चल रही ठंढी हवाएं,
जिसमे फूलों की भीनी सी खुशबू है समाएं ,
मनो जग रही हो नयी आशायें ।

चाँद अब पद चूका मद्धिम
सूरज की लालिमा बढ़ रही हरपल,
मोती सी ओंस बिखरी हरी घास पे
रात जाने लगी और दिन आया पुरे शबाब पे ।

आज की तेज जिन्दगी का है ये हाल,
न पता चलता कब हुआ सवेरा
और न ही दीखता कब घिरा अंधेरा
ऐसी सुन्दर और मोहक सुबह ने,
मन के अन्दर तारों को उकेरा,
प्राण किया अब मैंने भी रोज देखूंगा ये सवेरा ।

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