रातों को सोता हूँ तो नींद नही आती है
और दिन जम्हाइयों में गुजर जाती है ।
खाने को जाता हूँ तो भूख चली जाती है
और खली बैठा हूँ तो भूख बहुत सताती है ।
भीड़ मे बैठा तो सन्नाटे की खवाहिश होती है
और अकेला राहूँ तो तन्हाई काट खाती है ।
जब न हो कोई लाइफ में तो, उनकी खवाहिश होती है
और जब आ जाये जिन्दगी जहन्नुम बन जाती है ।
ये ही इनसान की फितरत है ...
और दिन जम्हाइयों में गुजर जाती है ।
खाने को जाता हूँ तो भूख चली जाती है
और खली बैठा हूँ तो भूख बहुत सताती है ।
भीड़ मे बैठा तो सन्नाटे की खवाहिश होती है
और अकेला राहूँ तो तन्हाई काट खाती है ।
जब न हो कोई लाइफ में तो, उनकी खवाहिश होती है
और जब आ जाये जिन्दगी जहन्नुम बन जाती है ।
ये ही इनसान की फितरत है ...