पहली दफ़ा स्कूल की चारदीवारी में
घर की याद थी और मन घबराया
सोच ही रहा था क्यों किया माँ ने ऐसा
तभी कई नन्हे हाथों ने हाथ बढ़ाया
शायद ये ही शुरुआत थी, दोस्ती की।
रख कंधों पे हाथ एक दूजे के
निकलते थे जब हम राहों पे
फ़िल्म-तमाशे, खेल-खिलाड़ी और शक्तिमान की बातों में
बीतते रहे दिन, हंसी- ठिठोली, छूपम-छुपाई
खुशी और निश्छल प्रेम के साये में
शायद ये ही मिठास थी दोस्ती की।
नई साईकल की धौंस दिखाना
और बाद में उसपर सबको बिठाना
हमारी गलतियों को टीचर से छुपाना
और टिफ़िन बॉक्स से लंच चुराना
शायद यादें ये कभी भूल न पाएं, दोस्ती की।
क्लास के पहले होमवर्क की कॉपी कराना
और एग्जाम में मंदबुद्धियों को कॉपी दिखाना
झूठ बोलकर सबकी मम्मियों से बचाना
और इन अहसानों का का कर्ज चॉक्लेट से चुकाना।
शायद ये ही अच्छी आदतें थी बचपन के दोस्ती की।
घर की याद थी और मन घबराया
सोच ही रहा था क्यों किया माँ ने ऐसा
तभी कई नन्हे हाथों ने हाथ बढ़ाया
शायद ये ही शुरुआत थी, दोस्ती की।
रख कंधों पे हाथ एक दूजे के
निकलते थे जब हम राहों पे
फ़िल्म-तमाशे, खेल-खिलाड़ी और शक्तिमान की बातों में
बीतते रहे दिन, हंसी- ठिठोली, छूपम-छुपाई
खुशी और निश्छल प्रेम के साये में
शायद ये ही मिठास थी दोस्ती की।
नई साईकल की धौंस दिखाना
और बाद में उसपर सबको बिठाना
हमारी गलतियों को टीचर से छुपाना
और टिफ़िन बॉक्स से लंच चुराना
शायद यादें ये कभी भूल न पाएं, दोस्ती की।
क्लास के पहले होमवर्क की कॉपी कराना
और एग्जाम में मंदबुद्धियों को कॉपी दिखाना
झूठ बोलकर सबकी मम्मियों से बचाना
और इन अहसानों का का कर्ज चॉक्लेट से चुकाना।
शायद ये ही अच्छी आदतें थी बचपन के दोस्ती की।