Wednesday, August 1, 2018

अक़ीक़

था इन्तज़ार इस दफ़े भी
कि शायद बद्र के ढलते ही
सुर्ख़ सुब्ह की गर्माहट से
पड़ी बर्फ पिघल ही जाए।

पर ये तो बस एक ख़्वाब ही था
और शायद हो क्यों न
फ़िरदौस की तमन्ना लाजमी है
हर इंसा के लिए।

बेरुखी की इंतहा ये है
हम गैर है और अब अजनबी भी
पर इत्तफ़ाक़ का आलम ये है
हम भी कभी अक़ीक़ हुआ करते थे।



3 comments:

  1. बात तो आपने सही कहीं है सर ...
    रहते थे कभी जिनके दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह !!
    बैठे हैं उन्ही के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह !!

    ReplyDelete
  2. सुभानाल्लाह

    ReplyDelete