Wednesday, September 12, 2018

आख़री मुलाक़ात और आखरी याद


हमेशा की तरह आज भी मै यानी प्रियम और मेरी दोस्त अमिता अपने पसंदीदा रेस्तरां में मिले| पसंदीदा इसलिए की यहाँ के खाने की बात कुछ और थी, हम यहाँ के लच्छा पराठे और शाही पनीर के दीवाने थे, काफी लज़ीज जो थे | और धीमी सी आवाज़ के साथ चलने वाले  मधुर गीत मन को बड़ा सुकून देते है| हमदोनों अक्सर यहाँ आते है, शायद सप्ताह में एक या बार और किनारे वाली टेबल पे घंटो वक़्त बिताते है| बड़ा लगाव हमें इस जगह से, पता नहीं क्यों?
                     आज मै थोड़ा ज़्यादा ही खुश था, अरे क्यों होऊं, अक्सर मै उसे ज़िद कर मिलने बुलाता था और आज उसने ज़ोर देके आने को कहा| और छुपाऊंगा नहीं बिल भी उसने देने की बात की है| लेकिन सच ये भी है मै कभी कभार ही बिल चुकता था, अक्सर वो ही पैसे देती थी, मेरी जेब तो खली रहती है हमेशा |
 मैंने बनावटी गुस्सा बनाते हुए कहा, अभी परसों ही तो मिले थे और मुझे इतना सारा काम था, फिर भी तुमने मुझे ज़बरदस्ती मिलने को क्यों बुलाया?
वो कुछ बोली नहीं, बस अपनी बड़ी -बड़ी आँखों से होठों पे हलकी मुस्कान लिए एकटक मुझे देखे जा रही है |
पता नहीं क्यों अब मुझे ग़ुस्सा रहा है |
मैंने कहा, मै तुमसे कुछ पूछ रहा हूँ, और तुम मुस्कुरा रही हो | मैंने फिर कहा, अभी परसों ही चार घंटे तुम्हारे साथ घूमने के बाद मुझे तुम्हारे मेहंदी लगाने के चक्कर में एक घंटे तक मेहंदी वाले के पास धूप में खड़ा रहना पड़ा था, याद है | और मुझे आज जरूरी काम भी था |
उसने अब कहा, तो मेहंदी का डिज़ाइन भी तुमने ही पसंद किया था, देखो कैसी लग रही है| उसने दोनों हथेलियों को मेरे सामने खोलकर रखा|
उसकी ये प्यारी बातें सुनकर मुझे बड़ा अच्छा लगा, सारा ग़ुस्सा काफूर था और ऐसा लग रहा, जैसे सारा प्यार मै आज ही उसपे उड़ेल कर दूँ |

अभी मै ये सब सोच ही रहा था की, इतने में उसने अपना पर्स खोला और एक सोने की अंगूठी टेबल पर मेरे सामने रख दिया | मै कुछ समझ पाता, उससे पहले ही उसने हल्की और भारी आवाज़ के साथ कहा, "मेरी कल शाम को सगाई हो गई"|
        इतना सुन मै पूरी तरह शांत पड़ गया और वो मुझे देखती रही| मेरे चेहरे पे अब कोई भाव नहीं थे| हमदोनो बस एक दूसरे को देखे जा रहे थे, मै चाह के भी अपनी आसुओं को रोक नहीं पा रहा, उसकी आँखें भी डब-डबाई है, लाल हो चुकी है|

         सहसा तभी एक गाने की धुन हमारे कानो तक पंहुची,
"हमको भी है खबर, तुमको भी है पता,
हो रहा, है जुदा दोनों का रास्ता,
 दूर जाके भी, तुम मेरी यादों में रहना,
 कभी अलविदा कहना
कभी अलविदा कहना "|
     इतना सुनने के बाद एकाएक दोनों जोर से है हंस पड़े और एकसाथ कहा पूरा फ़िल्मी मंजर हो गया ये तो, मै शाहरुख़ और तुम रानी| और फिर एक हल्की सी मुस्कान थी दोनों के चेहरे पे, पर आँखें नाम है |
उसने आखिर में कहा मै मेहंदी तुम्हारे पसंद की लगाना चाह रही, इसलिए तुम्हे धुप में खड़ा रहना पड़ा| सॉरी,अब तुम्हे आगे तंग नहीं करुँगी |  इतना कह, उसने मेरे हाथों कोअपने हाथों से पकड़ा और ...  



"अरे कहाँ खोये हो", मेरी पत्नी ने मेरे हाथों को झकझोरते हुए कहा | ये लो मेनू, मुझे तो कुछ समझ ही नहीं रहा क्या आर्डर करूँ ?
तुम्ही देख के मंगवा लो, कुछ अच्छा |

मैंने मेनू कार्ड छोड़ वेटर को देखा, वो मुझे देख कर मुस्कुरा रहा था, शायद उसने मुझे पहचान तो नहीं लिया? पर कैसे 10 साल हो गए, ख़ैर जो भी हो, मैंने अपने को शांत किया |

मैंने वेटर से कहा, आप एक काम करो लच्छा पराठा और शाही पनीर हो तो उसे ही ले आइये |
वेटर ने हल्के शब्दों में कहा,आज भी वही?

Tuesday, September 4, 2018

असफल प्रेमी का वेलेंटाइन विश्लेषण

आज बाजार में ये प्रतीत हो रहा था जैसे कोई त्यौहार आने वाला है, बाद में जानकारी मिली युवाओं का बहुप्रतीक्षित एक सप्ताह तक चलने वाले त्यौहार की त्यारियां जोर शोर पे है। टेडी बेयर, गिफ्ट्स, कार्ड्स, नए नए तरह के चोक्लेटस से दुकाने अटी पड़ी है। फूलों की दुकाने भी सज गयी है। युवको और युवतियों के हुजूम और गलबहियां चारों तरफ है।

आज अगर वेलेटाइन बाबा इस दुनिया में होते तो देख कर कितने प्रफुल्लित होते। उनके द्वारा शूरू की गयी प्रेम दिखाने या प्रदर्शित करने की प्रथा आज कितनी तेजी से फैली है।

ये अल्फ़ाज़ मेरे नही उन युवकों के है जिन्हें इस वेलेटाइन कुछ हाथ नही आया।

ख़ता

देखा आज उसको अर्सों बाद
दोष मेरा ही नही केवल
आंखें तो उसने भी चुरा ली

तकता रहा उसे यूंही छुप छुपकर
और कोशिश उसने भी की
पर शिकवे ही थे जो भारी पड़ गए

आज छाई है ख़ामोशी हर तरफ
जहां अल्फ़ाज़ों के ताल सज़ा करते थे
अब सन्नाटों का बस घेरा है

ख़ता मुझसे हुई या रही तुम्हारी
नहीं मतलब इन सवालों का
अब तो हमदोनों अज़नबी हो चले 





Sunday, August 5, 2018

दोस्ती और बचपन

पहली दफ़ा स्कूल की चारदीवारी में
घर की याद थी और मन घबराया
सोच ही रहा था क्यों किया माँ ने ऐसा
तभी कई नन्हे हाथों ने हाथ बढ़ाया

शायद ये ही शुरुआत थी, दोस्ती की।

रख कंधों पे हाथ एक दूजे के
निकलते थे जब हम राहों पे
फ़िल्म-तमाशे, खेल-खिलाड़ी और शक्तिमान की बातों में
बीतते रहे दिन, हंसी- ठिठोली, छूपम-छुपाई
खुशी और निश्छल प्रेम के साये में

शायद ये ही मिठास थी दोस्ती की।

नई साईकल की धौंस दिखाना
और बाद में उसपर सबको बिठाना
हमारी गलतियों को टीचर से छुपाना
और टिफ़िन बॉक्स से लंच चुराना

शायद यादें ये कभी भूल न पाएं, दोस्ती की।

क्लास के पहले होमवर्क की कॉपी कराना
और एग्जाम में मंदबुद्धियों को कॉपी दिखाना
झूठ बोलकर सबकी मम्मियों से बचाना
और इन अहसानों का का कर्ज चॉक्लेट से चुकाना।

शायद ये ही अच्छी आदतें थी बचपन के दोस्ती की।


Saturday, August 4, 2018

इल्मे इश्क़

इश्क़ की रवायतों से अनजान नही हम
हम भी कभी इश्के तालिब -इल्मी थे
वफ़ा-ए- इश्क़ अंजाम क्या होता है
वाकिफ हूं जनाब, कहता हूँ ईमान से।