Friday, May 1, 2020

हाँ मैं बुद्धिजीवी पत्रकार हूं।

वैसे मैने फेसबुक पे तब से कुछ लिखना छोड़ दिया, जब से फेसबुक पे लोग अपनी अभिव्यक्ति कम और दूसरे के फैलाये पोस्ट को ज्यादा शेयर करना शूरु कर दिये (ऐसा मै नही फेसबुक का भी कहना है)। मेरे फेसबुक मित्र मंडल में कुछ बड़े पत्रकार, तथकथित बुद्धिजीवी और कुछ निराशावादी लोग भी है। मैं हमेशा सभी के पोस्ट को (चाहे वो शेयर पोस्ट ही क्यों न हो) देखता हूं और अध्यन करता हूँ।
पर आज मैंने अभी तक भारत की  UN सिक्योरिटी कॉन्सिल में जीत (मसूद अजहर पे बैन) पर एक भी पोस्ट उन लोगों द्वारा नही देखा। शायाद इससे ये प्रतीत होता है कि, उनलोगों को इसमे भारत की जीत से ज्यादा किसी और कि जीत ज्यादा दिख रही है। या कुछ यूं कहें कि, वो अभी भी सकते में, हैं ऐसे कैसे हो सकता है, चीन हमे धोखा कैसे दे सकता है? खैर सभी मौन है। और ये पहली बार नही हुआ कमोबेश यही हाल एयर स्ट्राइक के समय भी था। मै दावा तो नही कर रहा पर वो लोग अपनी पोस्ट को दुबारा देख सकते है।
किया किसी ने भी हो, श्रेय किसी भी जाये पर जीत भारत की थी और अभी भी है। बड़े बड़े पोस्ट और दूसरों को गलत बताने वाले पोस्ट के साथ साथ कभी भारत की बात कर ले तो नुकशान नही होगा। निराशावादी होने से बेहतर आशावादी होना है। आप जिसके भी पक्षदार हों, फर्क नही पड़ता पर कभी भारत की बात कर लें और कभी कभार एजेंडे से भी दूर रह कर भारत की बात करने वाला भी बने। आप किसी के भी पक्षदर हो, फर्क नही पड़ता, पर मेरे ख्याल पहले आप भारत के पक्षधर है, तो संकोच क्यों? ये तो भारत के 130 करोड़ लोगों का सामर्थ्य है, जिस पर दुनिया को भरोसा हुआ।
ये मेरे अपने विचार है, शयाद आप इससे इतेफाक़ न रखते हों, पर मुझे आज जो प्रतीत हुआ वो उद्गार को मैने अपने शब्द दिए। सहमत और असहमति आपका लोकतांत्रिक अधिकार है।

Sunday, April 12, 2020

अहमियत तुम्हारी


होते हो तुम क्यों निराश
तुझमे भी कुछ बात है खास
ढूंढे जाओगे तुम भी फिर
एक बार उसी शिद्दत से
जहां है तुझसे काम।
फेंक दी जाती जाली तीलियाँ
दिया जलाने के बाद।
लेकिन फिर...
बुझा दिए जाते है दीप अहले सवेरे
पर शाम का क्या!!!
जब दीपक की है दुबारा दरकार
ढूंढी जाएगी दिया-सलाई
फिर से एक बार...
मोल कम होता नही किसी का
इस जहां में कभी
बस समय बुनता है किरदार सबका
कभी तुम्हारी कम असकी एहमियत बढ़ी।
बस यही तो राज है सबके जीवन का।

सिर्फ एक भारतीय

एक आम आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है, बाहर आ कर साबुन से हाथ धोता है,
दाँत ब्रश करता है, नहाता है, कपड़े पहनकर तैयार होता है, अखबार पढता है, नाश्ता करता है,
घर से काम के लिए निकल जाता है, बाहर निकल कर रिक्शा करता है, फिर लोकल बस या ट्रेन में या अपनी सवारी से ऑफिस पहुँचता है, वहाँ पूरा दिन काम करता है, साथियों के साथ चाय पीता है, शाम को वापिस घर के लिए निकलता है, घर के रास्ते में एक सिगरेट फूँकता है,
बच्चों के लिए टॉफी, बीवी के लिए मिठाई वगैरह लेता है,
मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है,
अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई "हिन्दू" या "मुसलमान" मिला ?
क्या उसने दिन भर में किसी "हिन्दू" या "मुसलमान" पर कोई अत्याचार किया ?
उसको जो दिन भर में मिले वो थे.. अख़बार वाले भैया, दूध वाले भैया, रिक्शा वाले भैया,
बस कंडक्टर, ऑफिस के मित्र, आंगतुक, पान वाले भैया, चाय वाले भैया, टॉफी की दुकान वाले भैया,
मिठाई की दूकान वाले भैया..
जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो इनमें "हिन्दू" या "मुसलमान" कहाँ है ?
"क्या दिन भर में उसने किसी से पूछा कि भाई, तू "हिन्दू" है या "मुसलमान" ?
अगर तू "हिन्दू" या "मुसलमान" है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा,
तुझसे सिगरेट नहीं खरीदूंगा,
तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा,
तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा,
क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, मिठाई खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले "हिन्दू" हैं या "मुसलमान" ?

"जब हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मिलने वाले लोग "हिन्दू" या "मुसलमान" नहीं होते तो फिर क्या वजह है कि "चुनाव" आते ही हम "हिन्दू" या "मुसलमान" हो जाते हैं ?
समाज के तीन जहर
टीवी की बेमतलब की बहस
राजनेताओ के जहरीले बोल
और  कुछ कम्बख्त लोगो के सोशल मीडिया के भड़काऊ मैसेज
इनसे दूर रहे तो  शायद बहुत हद तक समस्या तो हल हो ही जायेगी

Saturday, October 12, 2019

क्यूं...

पता नही, क्यूं
आज भी, शिद्दत से
ये दिल तुम्ही को चाहता है।

मै हूँ, तेरी यादें है
एक तस्वीर भी है तेरी,
अलमारी में संजो रखा है।

और वो तुम्हारा पहला ख़त
जिसमे एहसास है तेरे
आज भी रखा है संभाल कर।

पता नही, क्यूं
आज भी, शिद्दत से
ये दिल तुम्ही को चाहता है।

Friday, September 13, 2019

इश्क़-एक लंबा सफर

ये जो इश्क़ है
इक लंबा सफर है
चलो कुछ अल्फ़ाज़ रहने दो।

बातें करेंगे एक दूजे की
धीमे धीमे, आहिस्ता आहिस्ता
रस्ते को बस यूंही चलने दो।

कुछ तुम अपनी कहो
कुछ मेरी सुनो, जल्दी किसे है
खामोशियों को भी कुछ जगह रहने दो।

ये जो इश्क़ है
इक लंबा सफर है
चलो कुछ अल्फ़ाज़ रहने दो।

Contd...