Tuesday, March 19, 2013

मन की उलझन

उलझने इतनी की सुलझा नही पता हूँ मै,
रस्ते है कितने, सही रह चुन नही पता हूँ मै ।

उलझनों को सुलझाने में खुद ही उलझ जाता हूँ मै
और रस्ते बनाने में खुद रह भटक जाता हूँ मै ।

जीवन की कठिन है राहें
जहाँ मंजिले है धुंधली
रस्ते है पथरीले
और दूर तक है फैला नीला आसमां
नाहि है कहीं हरी भरी छांव
यहाँ दूर तक दीखता नही कोई गाँव ।

पर मन में है एक मद्धिम सी आशा और पूरा विश्वास
पंहुचना है उस छोर तक जहाँ धरती को छूता हो आकाश ।

आत्म निश्चय और आशाओं से अब समझ में आया
उलझाने रेशम की धागों की तरह होती है
जो उलझती है पर सुलझाती भी है
गांठ का होता नहीं यहाँ नामो - निशां
और यही है आचे रेशम की पहचां ।

Sunday, March 17, 2013

उलझन

जब हमने उनसे दिल का हाल पूछा
वो मुस्कुरा के चल दिये
आज भी उलझन में  हूँ
वो इकरार था या मेरी नादानी की निशानी|

नादान इश्क चालक मोहब्बत

तुम सोचते हो वो   तुम्हे लाइन
क्यों वास्ते करते इसमें अपना टाइम
उसके तो चक्कर कईयों से है
तुम्हारा तो नंबर है नाइन

Saturday, March 9, 2013

ज़ख्म


ज़ख्म बनते है, भरते भी है,
पर उम्र भर दाग छोड़ जाते है 
उल्फत भी वैसी ही है , ये होती है टूट जाती है 
पर ताउम्र एक एहसास छोड़ जाती है ।

मखमली सरसराहट


नरम  की वो मखमली सरसराहट 
और उनकी आँखों की वो  जगमगाहट 
 काफी है किसी को  दिवाना बना दे 
जैसे हो हो उनके आने की आहट |