Tuesday, March 19, 2013

मन की उलझन

उलझने इतनी की सुलझा नही पता हूँ मै,
रस्ते है कितने, सही रह चुन नही पता हूँ मै ।

उलझनों को सुलझाने में खुद ही उलझ जाता हूँ मै
और रस्ते बनाने में खुद रह भटक जाता हूँ मै ।

जीवन की कठिन है राहें
जहाँ मंजिले है धुंधली
रस्ते है पथरीले
और दूर तक है फैला नीला आसमां
नाहि है कहीं हरी भरी छांव
यहाँ दूर तक दीखता नही कोई गाँव ।

पर मन में है एक मद्धिम सी आशा और पूरा विश्वास
पंहुचना है उस छोर तक जहाँ धरती को छूता हो आकाश ।

आत्म निश्चय और आशाओं से अब समझ में आया
उलझाने रेशम की धागों की तरह होती है
जो उलझती है पर सुलझाती भी है
गांठ का होता नहीं यहाँ नामो - निशां
और यही है आचे रेशम की पहचां ।

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