था इन्तज़ार इस दफ़े भी
कि शायद बद्र के ढलते ही
सुर्ख़ सुब्ह की गर्माहट से
पड़ी बर्फ पिघल ही जाए।
पर ये तो बस एक ख़्वाब ही था
और शायद हो क्यों न
फ़िरदौस की तमन्ना लाजमी है
हर इंसा के लिए।
बेरुखी की इंतहा ये है
हम गैर है और अब अजनबी भी
पर इत्तफ़ाक़ का आलम ये है
हम भी कभी अक़ीक़ हुआ करते थे।
बात तो आपने सही कहीं है सर ...
ReplyDeleteरहते थे कभी जिनके दिल में हम जान से भी प्यारों की तरह !!
बैठे हैं उन्ही के कूचे में हम आज गुनहगारों की तरह !!
Bahot khoob👌👍
ReplyDeleteसुभानाल्लाह
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