Tuesday, July 4, 2023

रातों में नींद

अच्छा है वो हमें छोड़ गए ...
वरना रातों में नींद कहाँ आती थी।

Monday, July 3, 2023

 Chahaton se humne koi gila aur sikwa nhi, ye jindgi hi ache se kat jaye kafi hai jahan me...

 muflishi me hoon aur kaam ke bojh se presan, thoda likhne se khushi mili to logo ne kaha shayar ho gaya JAWAN... :P :)

Thursday, May 26, 2022

दिल आवारा

हमने कभी उनसे मोहब्बत की आरज़ू न थी पर इस कम्बखत दिल को कौन समझाए धड़कता हर पल उनका ही नाम लेकर और वो न आये तो इसे कौन मनाये

Sunday, December 27, 2020

मेरी प्रियतम

 तुम कभी किसी बात पे जब रूठ जाती हो

लगता है तू पास होकर भी दूर चली जाती हो।


न रूठ मुझसे मेरी जाँ तू कभी

बिन तेरे मै अधूरा हूँ

तू नही तो कहां मैं पूरा हूँ।

बातें अधूरी तेरे बिन...

रातें कहाँ पूरी होती तेरे बिन...

दिन भी बोझिल से रहता है

जिस्म तो जागता है

पर मन तो बस सोता है।


जैसे चांद बिन चांदनी के अधूरा है

मेरा जीवन भी तेरे बिन कहाँ पूरा है।

मास्क वाली लड़की...

 याद है मुझे, वो सुबह निराली थी,

बोले तो समय कोविड वाली थी 

धड़कनों का था हाल बुरा और मन घबराया

आज उनसे पहली मुलाकात जो होनेवाली थी।


खड़ा सीढ़ियों पे उनकी राह तक रहा था,

और हनुमान चालीसा भी पढ़ रहा था,

कुछ अजीब सी फिलिंग महसूस कर रहा था,

कुछ गड़बड़ न हो, सोच डर रहा था।


दरवाजे पे उसकी गाड़ी आकर लगी थी,

पर ये क्या? लड़की तो मास्क वाली थी।

चेहरा छुपाये, 

शरमाये,

मुझसे नज़रे बचाये,

भीतर-भीतर मुझे खड़ूस बताये,

शायद अंदर ही अंदर देख मुझे चिड़चिड़ाये

और मुझसे मिलने को आये।

देख उसको मैं ठिठक गया,

दिल भी जाके उसी पे अटक गया

Blah blah blah....

मैं जाने कितनी बातें कह गया।

ये तो मेरे दिल का हाल था,

पर उसकी क्या - न जान पाया,

अनजान थे एकदूजे से हम,

शायद उसके मन था डर समाया

कैसा होगा वो समझ न था आया

फिर भी न जाने क्यूं, उसने बस हाँ में सर हिलाया।


आज का हाल ये है साहिब,

वो बिन मेरे अधूरी है,

मैं कहाँ उस बिन पूरा हूँ,

वो मेरी संगिनी और मैं उसका दिल का हीरा हूं।




Friday, August 14, 2020

भारत तू महान

 आन बान शान है तू, 

भारत महान है तू। 

कश्मीर से कन्याकुमारी तक,

कच्छ से क़ानुबरी तक,

बसता तू हर दिल मे,

नमन तेरे चरणों में, 

कुर्बान तुझपे मेरी जां

मेरा मुल्क सबसे महान।

राम की मर्यदा में तू

कृष्ण की गीता में तू

बुद्ध के ज्ञान में तू

महावीर के ध्यान में तू

गांधी की अहिंसा में तू

सुभाष के आह्वान में तू

कुर्बान तुझपे मेरी जां

मेरा मुल्क सबसे महान।

जय भारत 🇮🇳

Wednesday, July 22, 2020

बारिश से ग़ुज़ारिश

सुन ए  बारिश
मान भी काश्तकारों की गुज़ारिश
कर महफूज़ उनकी जिंदगी
उनको है तेरी बेइंतहा ख़्वाहिश।
आ बरस जा
सूखे इस ज़र्रे को
फिर से हरा कर जा।

सुन ले इल्तेज़ा उनकी
जा बरस जा उन मिट्टी की चादरों पे
जहां वो दरक पड़ी है
और एक दूसरे का दामन भी छोड़ा है।
तेरे आने से कुछ गीली होगी कुछ नरम
गुन्धी जाएगी वो हल के हाथों
एक सोंधी सी खुशबू की मेहक से
और नए जीवन का आगाज़ हो।

सुन ए  बारिश
मान भी काश्तकारों की गुज़ारिश
कर महफूज़ उनकी जिंदगी
उनको है तेरी बेइंतहा ख़्वाहिश

Wednesday, July 15, 2020

लो मान लिया रहबर नही मै तेरा
पर कुछ कदम तो साथ मैं भी चला
मान लिया कि मंजिल का पता न था
पर पहुंचना तो दोनों ने तय किया

Saturday, May 30, 2020

शिक्षा और बिहार

31 May 2017 को प्रकाशित 
साभार :  मेरी फेसबुक वॉल

बहुत कुछ पढ़ा और देखा सोशल मिडिया पर बिहार के बहुप्रतीक्षित इंटरमीडिएट के रिजल्ट को लेकर। पर तथ्य ये है कि "अगर बाबुल बोयेंगे और आम की कामना" करेंगे तो बहुत बेमानी होगी। जहाँ तक छात्रों की बात है तो ये पुरातन काल से ही कहावत चरितार्थ है कि अच्छे शिक्षक हो तो चेले उनसे भी अच्छे निकल जाते है। हमारे पास कई उदाहरण है इसके। सरकार की एक नीति ही ऐसे कारण की वजह बनी। ये बात सभी को पता है कि बिहार में प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की कग स्थिति है, कगजों पे नही हक़ीक़त में। ऐसे शिक्षकों की बहाली हुई जिन्हें sunday की स्पेलिंग नही आती( सभी नही पर बहुतायत)। ऐसे शिक्षकों से क्या उम्मीद की जा सकती है, वोट बैंक तो बन गया पर बौद्धिक बैंक में बिहार पिछड़ता चला गया। खाने ,साइकिल, छात्रवृति, पोशाक से  छात्र तो स्कूल आ जायेंगे पर वो मकसद अधूरा ही रह जाता है जिसकी वजह से उन्हें स्कूल लाया गया। और आगे हालात सुधरने की कोई गुंजाईश दिख नही रही, परीक्षा कदाचार मुक्त हो बहुत अच्छी बात है स्कूलों में शिक्षक की उपस्थिति हो फिर भी वो ज्ञान कौन देगा जो बच्चों को सही शिक्षा दे सके। ये पूर्णतः मेरे विचार है, आप अपने विचार भी रख सकते है।

Friday, May 1, 2020

हाँ मैं बुद्धिजीवी पत्रकार हूं।

वैसे मैने फेसबुक पे तब से कुछ लिखना छोड़ दिया, जब से फेसबुक पे लोग अपनी अभिव्यक्ति कम और दूसरे के फैलाये पोस्ट को ज्यादा शेयर करना शूरु कर दिये (ऐसा मै नही फेसबुक का भी कहना है)। मेरे फेसबुक मित्र मंडल में कुछ बड़े पत्रकार, तथकथित बुद्धिजीवी और कुछ निराशावादी लोग भी है। मैं हमेशा सभी के पोस्ट को (चाहे वो शेयर पोस्ट ही क्यों न हो) देखता हूं और अध्यन करता हूँ।
पर आज मैंने अभी तक भारत की  UN सिक्योरिटी कॉन्सिल में जीत (मसूद अजहर पे बैन) पर एक भी पोस्ट उन लोगों द्वारा नही देखा। शायाद इससे ये प्रतीत होता है कि, उनलोगों को इसमे भारत की जीत से ज्यादा किसी और कि जीत ज्यादा दिख रही है। या कुछ यूं कहें कि, वो अभी भी सकते में, हैं ऐसे कैसे हो सकता है, चीन हमे धोखा कैसे दे सकता है? खैर सभी मौन है। और ये पहली बार नही हुआ कमोबेश यही हाल एयर स्ट्राइक के समय भी था। मै दावा तो नही कर रहा पर वो लोग अपनी पोस्ट को दुबारा देख सकते है।
किया किसी ने भी हो, श्रेय किसी भी जाये पर जीत भारत की थी और अभी भी है। बड़े बड़े पोस्ट और दूसरों को गलत बताने वाले पोस्ट के साथ साथ कभी भारत की बात कर ले तो नुकशान नही होगा। निराशावादी होने से बेहतर आशावादी होना है। आप जिसके भी पक्षदार हों, फर्क नही पड़ता पर कभी भारत की बात कर लें और कभी कभार एजेंडे से भी दूर रह कर भारत की बात करने वाला भी बने। आप किसी के भी पक्षदर हो, फर्क नही पड़ता, पर मेरे ख्याल पहले आप भारत के पक्षधर है, तो संकोच क्यों? ये तो भारत के 130 करोड़ लोगों का सामर्थ्य है, जिस पर दुनिया को भरोसा हुआ।
ये मेरे अपने विचार है, शयाद आप इससे इतेफाक़ न रखते हों, पर मुझे आज जो प्रतीत हुआ वो उद्गार को मैने अपने शब्द दिए। सहमत और असहमति आपका लोकतांत्रिक अधिकार है।

Sunday, April 12, 2020

अहमियत तुम्हारी


होते हो तुम क्यों निराश
तुझमे भी कुछ बात है खास
ढूंढे जाओगे तुम भी फिर
एक बार उसी शिद्दत से
जहां है तुझसे काम।
फेंक दी जाती जाली तीलियाँ
दिया जलाने के बाद।
लेकिन फिर...
बुझा दिए जाते है दीप अहले सवेरे
पर शाम का क्या!!!
जब दीपक की है दुबारा दरकार
ढूंढी जाएगी दिया-सलाई
फिर से एक बार...
मोल कम होता नही किसी का
इस जहां में कभी
बस समय बुनता है किरदार सबका
कभी तुम्हारी कम असकी एहमियत बढ़ी।
बस यही तो राज है सबके जीवन का।

सिर्फ एक भारतीय

एक आम आदमी सुबह जागने के बाद सबसे पहले टॉयलेट जाता है, बाहर आ कर साबुन से हाथ धोता है,
दाँत ब्रश करता है, नहाता है, कपड़े पहनकर तैयार होता है, अखबार पढता है, नाश्ता करता है,
घर से काम के लिए निकल जाता है, बाहर निकल कर रिक्शा करता है, फिर लोकल बस या ट्रेन में या अपनी सवारी से ऑफिस पहुँचता है, वहाँ पूरा दिन काम करता है, साथियों के साथ चाय पीता है, शाम को वापिस घर के लिए निकलता है, घर के रास्ते में एक सिगरेट फूँकता है,
बच्चों के लिए टॉफी, बीवी के लिए मिठाई वगैरह लेता है,
मोबाइल में रिचार्ज करवाता है, और अनेक छोटे मोटे काम निपटाते हुए घर पहुँचता है,
अब आप बताइये कि उसे दिन भर में कहीं कोई "हिन्दू" या "मुसलमान" मिला ?
क्या उसने दिन भर में किसी "हिन्दू" या "मुसलमान" पर कोई अत्याचार किया ?
उसको जो दिन भर में मिले वो थे.. अख़बार वाले भैया, दूध वाले भैया, रिक्शा वाले भैया,
बस कंडक्टर, ऑफिस के मित्र, आंगतुक, पान वाले भैया, चाय वाले भैया, टॉफी की दुकान वाले भैया,
मिठाई की दूकान वाले भैया..
जब ये सब लोग भैया और मित्र हैं तो इनमें "हिन्दू" या "मुसलमान" कहाँ है ?
"क्या दिन भर में उसने किसी से पूछा कि भाई, तू "हिन्दू" है या "मुसलमान" ?
अगर तू "हिन्दू" या "मुसलमान" है तो मैं तेरी बस में सफ़र नहीं करूँगा,
तुझसे सिगरेट नहीं खरीदूंगा,
तेरे हाथ की चाय नहीं पियूँगा,
तेरी दुकान से टॉफी नहीं खरीदूंगा,
क्या उसने साबुन, दूध, आटा, नमक, कपड़े, जूते, अखबार, टॉफी, मिठाई खरीदते समय किसी से ये सवाल किया था कि ये सब बनाने और उगाने वाले "हिन्दू" हैं या "मुसलमान" ?

"जब हमारी रोजमर्रा की ज़िन्दगी में मिलने वाले लोग "हिन्दू" या "मुसलमान" नहीं होते तो फिर क्या वजह है कि "चुनाव" आते ही हम "हिन्दू" या "मुसलमान" हो जाते हैं ?
समाज के तीन जहर
टीवी की बेमतलब की बहस
राजनेताओ के जहरीले बोल
और  कुछ कम्बख्त लोगो के सोशल मीडिया के भड़काऊ मैसेज
इनसे दूर रहे तो  शायद बहुत हद तक समस्या तो हल हो ही जायेगी

Saturday, October 12, 2019

क्यूं...

पता नही, क्यूं
आज भी, शिद्दत से
ये दिल तुम्ही को चाहता है।

मै हूँ, तेरी यादें है
एक तस्वीर भी है तेरी,
अलमारी में संजो रखा है।

और वो तुम्हारा पहला ख़त
जिसमे एहसास है तेरे
आज भी रखा है संभाल कर।

पता नही, क्यूं
आज भी, शिद्दत से
ये दिल तुम्ही को चाहता है।

Friday, September 13, 2019

इश्क़-एक लंबा सफर

ये जो इश्क़ है
इक लंबा सफर है
चलो कुछ अल्फ़ाज़ रहने दो।

बातें करेंगे एक दूजे की
धीमे धीमे, आहिस्ता आहिस्ता
रस्ते को बस यूंही चलने दो।

कुछ तुम अपनी कहो
कुछ मेरी सुनो, जल्दी किसे है
खामोशियों को भी कुछ जगह रहने दो।

ये जो इश्क़ है
इक लंबा सफर है
चलो कुछ अल्फ़ाज़ रहने दो।

Contd...

Sunday, January 6, 2019

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।

धुन्ध की चादरें का साया था,
अब धूप की गर्माहट छा रही है।
हरे थे जो सरसों के खेत चहुं ओर
अब पीली सी गहरी परत मुस्कुरा रही है।

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।

पड़ी है जो नफरत की गर्द चादर दिल पर,
मिटाओ उसे कर बातें मिलकर।
रही होगी कुछ गलतियां तुम्हारी भी,
मानो उसे और बढ़ो आगे साथ चलकर।

बीता दिसम्बर जनवरी जा रही है।