Thursday, March 22, 2018

ख्वाहिश  नही  मुझे मशहुर  होने  की।
आप  मुझे  पहचानते  हो  बस  इतना  ही  काफी  है।
अच्छे  ने  अच्छा  और  बुरे  ने  बुरा  जाना  मुझे।
क्यों  की  जिसकी  जीतनी  जरुरत  थी  उसने  उतना  ही  पहचाना  मुझे।
ज़िन्दगी  का  फ़लसफ़ा भी  कितना  अजीब  है,
शामें  कटती  नहीं, और  साल  गुज़रते  चले  जा  रहे  हैं....!!
एक  अजीब  सी  दौड़  है  ये  ज़िन्दगी,
जीत  जाओ  तो  कई  अपने  पीछे  छूट  जाते  हैं,
और  हार  जाओ तो अपने ही पीछे  छोड़  जाते  हैं।

Sunday, February 11, 2018

अब सोच था कि,
जिंदगी के मज़े लेंगे
पर ये तो और उलझती चली गई।

Tuesday, January 30, 2018

उनकी सूरत और यादें

उनकी हर एक याद को जेहन में छुपा रखा है
उनकी हर एक मुलाक़ात को दिल मे दबा रखा है
वो हमें भूल भी जाये कोई गम नही यारों
उनकी सूरत आज भी सीने से लगा रखा है

Tuesday, January 23, 2018

वो दो ख़त...

लिखे थे तुमने दो ही ख़त मुझको
एक, जिसमे प्यार भरा था,
और दूसरे में, शिक़वा-गिला था...
आज तक बस यही सोच में है दिल
कौन सा ख़त, भला था
और कौन सा ख़त बुरा था...

Sunday, December 31, 2017

लो फिर बिता एक साल...

लो फिर बिता एक साल...

कुछ बातें, कुछ यादें,
कुछ लम्हे, कुछ जज़्बात,
कुछ सपने, कुछ शिकायतें,
कुछ हुए पूरे, कुछ रहे अधूरे।

किसी को प्यार दिया, कहीं से प्यार मिला,
किसी को मना लिया, कोई रूठा ही रहा,
कहीं नजदीकियां बढ़ी, तो कहीं फासला,
कुछ रिश्ते हुए कमजोर, कहीं गरमाहट रही।

कुछ वादे हुए पूरे, कुछ रहे अधूरे,
कुछ खाव्हिशें हुए सच, कुछ सपने ही रहे,
कुछ मंजिले हासिल हुई, कुछके रास्ते,
कहीं जीत मिली, कुछ हार के दीदार हुए।

किसी ने भरोसा तोड़ा, किसी ने उम्मीद बढाई,
कहीं आशाओं पे पानी फिर, कही नई किरण दिखी,
कहीं खुशी मिली, किसी ने गम भी दिया,
कहीं मुस्कुराहट दिखी, कहीं कड़वाहट।

समय निरंतर चलता रहा,
भावनाएं बदलती रही,
लोग मिलते रहे,
अनुभव होता गया,
जो मिला खुश रहा।

लो फिर बिता एक साल...