Saturday, August 4, 2018

इल्मे इश्क़

इश्क़ की रवायतों से अनजान नही हम
हम भी कभी इश्के तालिब -इल्मी थे
वफ़ा-ए- इश्क़ अंजाम क्या होता है
वाकिफ हूं जनाब, कहता हूँ ईमान से।

Wednesday, August 1, 2018

अक़ीक़

था इन्तज़ार इस दफ़े भी
कि शायद बद्र के ढलते ही
सुर्ख़ सुब्ह की गर्माहट से
पड़ी बर्फ पिघल ही जाए।

पर ये तो बस एक ख़्वाब ही था
और शायद हो क्यों न
फ़िरदौस की तमन्ना लाजमी है
हर इंसा के लिए।

बेरुखी की इंतहा ये है
हम गैर है और अब अजनबी भी
पर इत्तफ़ाक़ का आलम ये है
हम भी कभी अक़ीक़ हुआ करते थे।



Wednesday, July 18, 2018

इश्क़ ऐसे करो कि, धड़कन में उतर जाए,
सांस भी लें तो खुशबू उसी की आये
प्यार का नशा आँखों पर ऐसा छाए
बात कोई भी हो, जुबां पे नाम उसी का आये।

Saturday, July 14, 2018

तू नही है तो क्या
तेरी परछाई आज भी वन्ही दिखती है
बस तस्सल्ली हो जाती है
शायद तुम आज भी यहीं हो।
एक तो घुप काली रात और ऊपर से ये अँधेरी परछाई,
 हर तरफ सन्नाटा और जाने किधर से कोयल की कुक आयी,
अँधेरे की आगोश में सिमटा है सब कुछ,
और एक हम है जिसे अब तक नींद नही आयी।