Tuesday, September 4, 2018

ख़ता

देखा आज उसको अर्सों बाद
दोष मेरा ही नही केवल
आंखें तो उसने भी चुरा ली

तकता रहा उसे यूंही छुप छुपकर
और कोशिश उसने भी की
पर शिकवे ही थे जो भारी पड़ गए

आज छाई है ख़ामोशी हर तरफ
जहां अल्फ़ाज़ों के ताल सज़ा करते थे
अब सन्नाटों का बस घेरा है

ख़ता मुझसे हुई या रही तुम्हारी
नहीं मतलब इन सवालों का
अब तो हमदोनों अज़नबी हो चले 





Sunday, August 5, 2018

दोस्ती और बचपन

पहली दफ़ा स्कूल की चारदीवारी में
घर की याद थी और मन घबराया
सोच ही रहा था क्यों किया माँ ने ऐसा
तभी कई नन्हे हाथों ने हाथ बढ़ाया

शायद ये ही शुरुआत थी, दोस्ती की।

रख कंधों पे हाथ एक दूजे के
निकलते थे जब हम राहों पे
फ़िल्म-तमाशे, खेल-खिलाड़ी और शक्तिमान की बातों में
बीतते रहे दिन, हंसी- ठिठोली, छूपम-छुपाई
खुशी और निश्छल प्रेम के साये में

शायद ये ही मिठास थी दोस्ती की।

नई साईकल की धौंस दिखाना
और बाद में उसपर सबको बिठाना
हमारी गलतियों को टीचर से छुपाना
और टिफ़िन बॉक्स से लंच चुराना

शायद यादें ये कभी भूल न पाएं, दोस्ती की।

क्लास के पहले होमवर्क की कॉपी कराना
और एग्जाम में मंदबुद्धियों को कॉपी दिखाना
झूठ बोलकर सबकी मम्मियों से बचाना
और इन अहसानों का का कर्ज चॉक्लेट से चुकाना।

शायद ये ही अच्छी आदतें थी बचपन के दोस्ती की।


Saturday, August 4, 2018

इल्मे इश्क़

इश्क़ की रवायतों से अनजान नही हम
हम भी कभी इश्के तालिब -इल्मी थे
वफ़ा-ए- इश्क़ अंजाम क्या होता है
वाकिफ हूं जनाब, कहता हूँ ईमान से।

Wednesday, August 1, 2018

अक़ीक़

था इन्तज़ार इस दफ़े भी
कि शायद बद्र के ढलते ही
सुर्ख़ सुब्ह की गर्माहट से
पड़ी बर्फ पिघल ही जाए।

पर ये तो बस एक ख़्वाब ही था
और शायद हो क्यों न
फ़िरदौस की तमन्ना लाजमी है
हर इंसा के लिए।

बेरुखी की इंतहा ये है
हम गैर है और अब अजनबी भी
पर इत्तफ़ाक़ का आलम ये है
हम भी कभी अक़ीक़ हुआ करते थे।



Wednesday, July 18, 2018

इश्क़ ऐसे करो कि, धड़कन में उतर जाए,
सांस भी लें तो खुशबू उसी की आये
प्यार का नशा आँखों पर ऐसा छाए
बात कोई भी हो, जुबां पे नाम उसी का आये।