Sunday, August 5, 2018

दोस्ती और बचपन

पहली दफ़ा स्कूल की चारदीवारी में
घर की याद थी और मन घबराया
सोच ही रहा था क्यों किया माँ ने ऐसा
तभी कई नन्हे हाथों ने हाथ बढ़ाया

शायद ये ही शुरुआत थी, दोस्ती की।

रख कंधों पे हाथ एक दूजे के
निकलते थे जब हम राहों पे
फ़िल्म-तमाशे, खेल-खिलाड़ी और शक्तिमान की बातों में
बीतते रहे दिन, हंसी- ठिठोली, छूपम-छुपाई
खुशी और निश्छल प्रेम के साये में

शायद ये ही मिठास थी दोस्ती की।

नई साईकल की धौंस दिखाना
और बाद में उसपर सबको बिठाना
हमारी गलतियों को टीचर से छुपाना
और टिफ़िन बॉक्स से लंच चुराना

शायद यादें ये कभी भूल न पाएं, दोस्ती की।

क्लास के पहले होमवर्क की कॉपी कराना
और एग्जाम में मंदबुद्धियों को कॉपी दिखाना
झूठ बोलकर सबकी मम्मियों से बचाना
और इन अहसानों का का कर्ज चॉक्लेट से चुकाना।

शायद ये ही अच्छी आदतें थी बचपन के दोस्ती की।


1 comment:

  1. Really a great poem Sir which reminds us our childhood friendship..

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