Monday, February 8, 2016

प्रपोज DAY

करना था उन्हें प्रपोज
हाथ में लिया एक प्यरा सा रोज़
लिया मन में आशंकाएं
कहीं एक थप्पड़ ना पड़ जाए
मांगता चला ऊपर वाले से दुईएँ
हे प्रभु आज दिन अच्छा जाये
चल पड़ा उनके रास्ते
शायद कहीं मुलाकात हो जाये
देखो भगवान की क्या मर्जी थी
उसकी आँख, पहले से किसी और से लड़ी थी
हुआ मेरा दिल चुर चुर और मै गुर्राया
मेरे हाथों का फूल भी मुरझाया
सोचा अब करना है क्या
दिल ने तुरंत ही भेज उत्तर
इंतजार कर आगले प्रपोज डे का पुत्तर

Tuesday, June 2, 2015

Woh kahti hai jindgi ab berukhi se ho gayi hai
Kya pata is bhag daud me Shayad WO jina hi bhul gayi

Sunday, March 29, 2015

हमें मुहब्बत उनसे है...

उन्हें पता है, पता नही
की हमें मुहब्बत उनसे है
की हमें मुहब्बत उनसे है ।

बातें होती ढेर सारी सी,
 यहां - वहां की, खूब सारी सी,
व्हाट्सप्प से हो या फेसबुक से हो
स्माइली हो या हाईक स्टीकर हो,
पर अब तक उसे यह केह नही पाया
की हमें मुहब्बत उनसे है
की हमें मुहब्बत उनसे है ।

बातें होंगी तो झगड़ा  भी है ,
रिवेंज भी है रगड़ा भी है
आंसू भी है पर मुस्कान बहुत है
और बातों का अम्बार बहुत है 
पर अब तक उसे यह केह नही पाया
की हमें मुहब्बत उनसे है
की हमें मुहब्बत उनसे है ।

गुड मॉर्निग, गुड इवनिंग की पूछो मत,
सुबह यहीं से शाम यहीं तक
how are you, How's the day,
लंच किया, डिनर किया,
अब तो ये संस्कार से है,
पर अब तक उसे यह केह नही पाया
की हमें मुहब्बत उनसे है
की हमें मुहब्बत उनसे है ।

Thursday, November 6, 2014

मत करो किसी से इतनी मुहब्बत

मत करो किसी से इतनी मुहब्बत कि
टूटे तो आह भी निकल न सके
दर्द हो सीने में इस कदर की
सांस भी सलीके से न चल सके
पलकों का झरने रुक से जाते हैं
आँखों की झील जो सुख जाते हैं
रास्ते बहुत ही बोझिल हो चले है
चंद कदम भी अब मीलों, लगने लगे है
तसव्वुर हमारा उन्हें गंवारा नही
लगता है अब हम उन्हें प्यारे नही

Friday, October 17, 2014

फेसबुक की ये गलियां

रात के अंधेरे में
मद्धिम सी रौशनी
कंप्यूटर पे चलते हाथ
हरी बतियाँ
जलती और बुझती
कुछ बीते समय को बताती
फेसबुक की ये गलियां
कुछ नए लोगों से मिलाती
कुछ पुराने दोस्तों से मिलवाती
कुछ नए रिश्ते बनवाती
कुछ पुराने रिश्तों को और मजबूत बनाती
कुछ नए राह दिखाती
कहीं रिश्तों में गरमाहट लाती
कहीं रिश्तों में कड़वाहट भी जागती
फेसबुक की ये गलियां। …