Friday, October 17, 2014

फेसबुक की ये गलियां

रात के अंधेरे में
मद्धिम सी रौशनी
कंप्यूटर पे चलते हाथ
हरी बतियाँ
जलती और बुझती
कुछ बीते समय को बताती
फेसबुक की ये गलियां
कुछ नए लोगों से मिलाती
कुछ पुराने दोस्तों से मिलवाती
कुछ नए रिश्ते बनवाती
कुछ पुराने रिश्तों को और मजबूत बनाती
कुछ नए राह दिखाती
कहीं रिश्तों में गरमाहट लाती
कहीं रिश्तों में कड़वाहट भी जागती
फेसबुक की ये गलियां। …

Sunday, August 3, 2014

वो... हमारे दोस्त !!!

रूठता है वो, मनाता हूँ मै
रूठता हूँ मै, मनाता वो है
लंच भी छीन कर खाता वो है
घर से आई हर चीज की वाट लगता वो है
मेरी हर एक पसंद को भाभी बुलाता वो है
बात बात पे उससे शादी का साहस दिलाता वो है
हर छोटी सी ख़ुशी पे पार्टी की ज़िद लगाता वो है
दोस्ती की दुहाई देके जेब खाली करवाता वो है
हर बात पे बियर की जुगत लगता वो है
हर मुश्किल साथ खड़ा नज़र आता वो है
मेरी हर परेशानी अपनाता वो है
और रुलाएगा क्या केह कर मुस्कुराता वो है
ये वो बहुत याद आते है
ये वो हैं जो हमारे दोस्त कहलाते है

happy friendship Day
After a long time i wrote something
Thanks friends its due to you...  

Friday, September 6, 2013

सीधे रस्ते

सीधे रस्ते भी नही होते है आसान
जब दूर देखो तो दीखता धुंधला आसमान
टेढ़े मेढ़े रास्तों की अलग  ही है कहानी
बात पत्ते की बस ये है भाई
गर चले उसपर तो हर रह है आसान ।

Tuesday, May 14, 2013

तुझे पाके यूँ कभी खो दिया

तुझे पाके यूँ  कभी खो दिया ,
कभी लफ़्ज़ों में यूँ पिरो दिया ...
कभी साँस साँस में जिया तुझे,
कभी यादों में तेरी रो दिया ...
कभी लिख के तुझको पढ  लिया,
कभी खवाब सा तुझे गढ़ लिया ...
कभी थम गया सुनकर तुझे,
कभी कारवां सा बढ  गया ...
कभी रशमो - रिवाज़ सा जानकार ,
कभी देवता तुझे मानकर,
तेरे खवाब से मेरी रूह को,
मैंने बूंद बूंद भिगो दिया ...
तुझे पाके यूँ कभी खो दिया, 
कभी लफ़्ज़ों में यूँ पिरो दिया ...
कभी साँस साँस में जिया तुझे
कभी यादों में तेरी रो दिया ....

Tuesday, March 19, 2013

मन की उलझन

उलझने इतनी की सुलझा नही पता हूँ मै,
रस्ते है कितने, सही रह चुन नही पता हूँ मै ।

उलझनों को सुलझाने में खुद ही उलझ जाता हूँ मै
और रस्ते बनाने में खुद रह भटक जाता हूँ मै ।

जीवन की कठिन है राहें
जहाँ मंजिले है धुंधली
रस्ते है पथरीले
और दूर तक है फैला नीला आसमां
नाहि है कहीं हरी भरी छांव
यहाँ दूर तक दीखता नही कोई गाँव ।

पर मन में है एक मद्धिम सी आशा और पूरा विश्वास
पंहुचना है उस छोर तक जहाँ धरती को छूता हो आकाश ।

आत्म निश्चय और आशाओं से अब समझ में आया
उलझाने रेशम की धागों की तरह होती है
जो उलझती है पर सुलझाती भी है
गांठ का होता नहीं यहाँ नामो - निशां
और यही है आचे रेशम की पहचां ।